जानिए क्या है “जमानत” का कानून!

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आपराधिक मामलों के संदर्भ में सर्वाधिक प्रचलित शब्द ज़मानत होता है। जब भी कोई
व्यक्ति किसी प्रकरण में अभियुक्त बनाया जाता है और अन्वेषण (Investigation), जांच
(Inquiry) और विचारण (Trial) के लंबित रहते हुए उस व्यक्ति को कारावास में रखा जाता है
तब ज़मानत शब्द, उस अभियुक्त के लिए सबसे अधिक उपयोग में लाया जाता है। इस
आर्टिकल के माध्यम से ज़मानत के मूल अर्थ को समझा जा सकता है। ज़मानत क्या है ?
क्या है इतिहास?
ज़मानत शब्द जिसे अंग्रेजी में बेल (Bail) कहते हैं, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) के
अध्याय 33 में शामिल की गयी जब भी किसी अभियुक्त को जेल में रखा जाता है तब उस
पर अन्वेषण, जांच और विचारण या अपील की कार्यवाही लंबित रहती है। ऐसी स्थिति में यह
तय नहीं होता है कि किसी प्रकरण में यदि किसी व्यक्ति को अभियुक्त बनाया है तो वह
अभियुक्त दोषमुक्त होगा या दोषसिद्ध होगा। यदि अभियुक्त किसी प्रकरण में दोषमुक्त
हो जाता है और लंबे समय तक उस व्यक्ति को कारावास में रखा जाता है तो यह उस
व्यक्ति के प्रति अन्याय ही होगा।
इस अन्याय से बचने के लिए अभियुक्त को दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अध्याय 33 की
विभिन्न धाराओं के अंतर्गत ज़मानत दी जा सकती है। ज़मानत से तात्पर्य कैदी की हाजिरी
सुनिश्चित करने हेतु ऐसी सिक्योरिटी से है, जिसको देने पर अभियुक्त को अन्वेषण अथवा
विचारण के लंबित होने की स्थिति में छोड़ दिया जाता है।
एक सामान्य नियम यह है कि ‘ज़मानत न कि जेल’ (बेल एंड नॉट जेल) के नाम से संबोधित
किया जाता है। कोई व्यक्ति जिसके खिलाफ केवल यह संभावना या आशंका है कि उसने
अपराध किया होगा, सीधे अदालत के समक्ष हाजिर होकर ज़मानत के लिए याचना कर सकता
है। जब तक कि उसे वास्तव में गिरफ्तार न कर लिया गया हो या उसके विरुद्ध गिरफ्तारी
वारंट जारी न किया गया हो। गिरफ्तारी वारंट के आधार पर उसके गिरफ्तार किए जाने की
संभावना उत्पन्न न हुई हो।
ज़मानत कब दी जा सकती है
यदि अपराध ज़मानतीय हो तो ज़मानत पर रिहाई का अभियुक्त का अधिकार होता है। इस
प्रकार की ज़मानत अभियुक्त पुलिस अधिकारी या न्यायालय इनमें से किसी से भी
अधिकारपूर्वक मांग सकता है। न्यायालय और पुलिस अधिकारी को उन अपराधों में ज़मानत
देना ही होती है, जिन अपराधों में ज़मानत दिया जाना अभियुक्त का अधिकार होता है।

भारतीय दंड संहिता 1860 (आईपीसी) के कौन से अपराध ज़मानतीय हैं यह दंड प्रक्रिया
संहिता 1973 की प्रथम अनुसूची में उपबंधित किया गया है। ज़मानत के प्रावधानों से संबंधित
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) के अध्याय 33 की निम्न चार धाराएं विशेष धाराएं हैं।
सीआरपीसी की धारा 436 सीआरपीसी (Crpc) की यह धारा यह उपबंधित करती है कि जहां
किसी ज़मानती अपराध के अभियुक्त को गिरफ्तारी व निरुद्ध किया जाता है तो वह
अधिकार के रूप में ज़मानत पर छोड़े जाने का दावा कर सकता है। यह धारा ऐसे सभी
मामलों के प्रति लागू होती है, जिनमें अभियुक्त किसी ज़मानतीय अपराध का दोषी है या वह
ऐसा व्यक्ति है, जिसने कोई अपराध नहीं किया है लेकिन इसके विरुद्ध संहिता के अध्याय 8
के अंतर्गत प्रतिभूति की कार्रवाई की गयी है। यह धारा किसी अन्य गिरफ्तारी या निरोध के
मामले में भी लागू होगी बशर्ते कि वह किसी गैर ज़मानतीय अपराध से संबंधित नहीं है। जब
कोई गैर ज़मानतीय अपराध के अभियुक्त से कोई व्यक्ति पुलिस थाने के भारसाधक
अधिकारी द्वारा बिना वारंट के गिरफ्तार व निरुद्ध किया जाता है या न्यायालय के समक्ष
हाजिर होता है तो उसे ज़मानत पर छोड़ दिया जाएगा। पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी
या न्यायालय उस व्यक्ति को ज़मानत पर छोड़ने के बजाय उससे प्रतिभूतियों सहित या
रहित बंधपत्र निष्पादित करवाकर उसे अभिरक्षा से उन्मोचित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के
एक फैसले में यह सुनिश्चित किया गया है कि जब अभियुक्त को किसी ज़मानतीय अपराध
के अभियोग की दशा में धारा 436 के अधीन जमानत पर छोड़ दिया जाता है उसके के बाद
पुलिस द्वारा उसकी रिहाई पर उसके विरुद्ध एक गैर जमानतीय अपराध और जोड़ दिया
जाता है। उस दशा में जारी की गई ज़मानत को निरस्त नहीं किया जा सकता। ज़मानत तो
धारा 439 (2) या 437 (5) के अधीन ही रद्द की जा सकती है। गुडी कांति नरसिंहुलु बनाम
लोक अभियोजक आंध्र प्रदेश 1978 उच्चतम न्यायालय के एक विशेष प्रकरण में जमानत
संबंधी कुछ नियम बनाये गये-
1)- मजिस्ट्रेट द्वारा ज़मानत मंज़ूर किए जाने अथवा नहीं किए जाने का निर्णय पूर्व
सावधानी बरतते हुए युक्तियुक्तता के आधार पर किया जाना चाहिए।
2)- ज़मानत नामंज़ूर की जाने के फलस्वरूप अभियुक्त को स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित
किया जाता है इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा इसका प्रयोग दाण्डिक उद्देश्य से नहीं किया जाना
चाहिए अपितु अभियुक्त और समाज दोनों के हितों को ध्यान में रखते हुए किया जाना
चाहिए।
3)- ज़मानत के आवेदन पर विचार करते समय मजिस्ट्रेट को इस बात पर विशेष ध्यान देना
चाहिए कि ज़मानत पर छोड़ दिए जाने पर अभियुक्त गवाहों के लिए खतरा उत्पन्न तो नहीं
करेगा या न्यायिक कार्यवाही के संचालन में बाधा उत्पन्न नहीं करेगा।
4)- ज़मानत के आवेदन पर विचार करते समय मजिस्ट्रेट को अभियुक्त के पूर्व वृतांत को भी
ध्यान में रखना चाहिए और यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि अभियुक्त की आपराधिक
गतिविधियों में लिप्त होने की संभावना तो नहीं है।

5)- सामान्यता अभ्यस्त और घोर अपराधियों की ज़मानत मंजूर नहीं की जानी चाहिए।
सीआरपीसी की धारा 437 सीआरपीसी (Crpc) 1973 की धारा 437 गैर ज़मानतीय अपराध की
दशा में कब ज़मानत ली जा सकेगी, इस संदर्भ में उल्लेख कर रही है। दंड प्रक्रिया संहिता की
यह धारा उस न्यायालय को अधिकार दे रही है, जिसके समक्ष अभियुक्त को पेश किया जाता
है। इस धारा के अंतर्गत गैर जमानतीय अपराध के ऐसे मामलों में जो मृत्युदंड या आजीवन
कारावास से दंडित न हो न्यायालय या पुलिस द्वारा अभियुक्त को ज़मानत पर छोड़े जाने के
संबंध में प्रावधान है। धारा 437 के अंतर्गत न्यायालय के साथ ही पुलिस को भी यह शक्ति
दी गई है कि वह भी किसी व्यक्ति को जमानत पर छोड़ सकती है पर उसके लिए कुछ शर्ते
निहित की गई हैं-
यदि अभियुक्त-
1)- 16 वर्ष से कम आयु का है।
2)- महिला या बीमार है।
3)- असक्षम और शिथलांग व्यक्ति है।
अपराध मृत्युदंड आजीवन कारावास से दंडित होने पर भी उसे ज़मानत पर छोड़ा जा सकता
है यदि ऊपर वर्णित निम्न शर्तों की पूर्ति होती है तो ज़मानतीय अपराध के अभियुक्त को
न्यायालय या पुलिस द्वारा ज़मानत पर छोड़े जाने के लिए अपनी विवेक शक्ति का प्रयोग
करते समय न्यायालय या पुलिस यथास्थिति को कतिपय सामान्य सिद्धांतों को ध्यान में
रखना होगा। उच्चतम न्यायालय ने

आपराधिक मामलों के संदर्भ में सर्वाधिक प्रचलित शब्द ज़मानत होता है। जब भी कोई
व्यक्ति किसी प्रकरण में अभियुक्त बनाया जाता है और अन्वेषण (Investigation), जांच
(Inquiry) और विचारण (Trial) के लंबित रहते हुए उस व्यक्ति को कारावास में रखा जाता है
तब ज़मानत शब्द, उस अभियुक्त के लिए सबसे अधिक उपयोग में लाया जाता है। इस
आर्टिकल के माध्यम से ज़मानत के मूल अर्थ को समझा जा सकता है। ज़मानत क्या है ?
क्या है इतिहास?
ज़मानत शब्द जिसे अंग्रेजी में बेल (Bail) कहते हैं, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) के
अध्याय 33 में शामिल की गयी जब भी किसी अभियुक्त को जेल में रखा जाता है तब उस
पर अन्वेषण, जांच और विचारण या अपील की कार्यवाही लंबित रहती है। ऐसी स्थिति में यह
तय नहीं होता है कि किसी प्रकरण में यदि किसी व्यक्ति को अभियुक्त बनाया है तो वह
अभियुक्त दोषमुक्त होगा या दोषसिद्ध होगा। यदि अभियुक्त किसी प्रकरण में दोषमुक्त
हो जाता है और लंबे समय तक उस व्यक्ति को कारावास में रखा जाता है तो यह उस
व्यक्ति के प्रति अन्याय ही होगा।
इस अन्याय से बचने के लिए अभियुक्त को दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के अध्याय 33 की
विभिन्न धाराओं के अंतर्गत ज़मानत दी जा सकती है। ज़मानत से तात्पर्य कैदी की हाजिरी
सुनिश्चित करने हेतु ऐसी सिक्योरिटी से है, जिसको देने पर अभियुक्त को अन्वेषण अथवा
विचारण के लंबित होने की स्थिति में छोड़ दिया जाता है।
एक सामान्य नियम यह है कि ‘ज़मानत न कि जेल’ (बेल एंड नॉट जेल) के नाम से संबोधित
किया जाता है। कोई व्यक्ति जिसके खिलाफ केवल यह संभावना या आशंका है कि उसने
अपराध किया होगा, सीधे अदालत के समक्ष हाजिर होकर ज़मानत के लिए याचना कर सकता
है। जब तक कि उसे वास्तव में गिरफ्तार न कर लिया गया हो या उसके विरुद्ध गिरफ्तारी
वारंट जारी न किया गया हो। गिरफ्तारी वारंट के आधार पर उसके गिरफ्तार किए जाने की
संभावना उत्पन्न न हुई हो।
ज़मानत कब दी जा सकती है
यदि अपराध ज़मानतीय हो तो ज़मानत पर रिहाई का अभियुक्त का अधिकार होता है। इस
प्रकार की ज़मानत अभियुक्त पुलिस अधिकारी या न्यायालय इनमें से किसी से भी
अधिकारपूर्वक मांग सकता है। न्यायालय और पुलिस अधिकारी को उन अपराधों में ज़मानत
देना ही होती है, जिन अपराधों में ज़मानत दिया जाना अभियुक्त का अधिकार होता है।

भारतीय दंड संहिता 1860 (आईपीसी) के कौन से अपराध ज़मानतीय हैं यह दंड प्रक्रिया
संहिता 1973 की प्रथम अनुसूची में उपबंधित किया गया है। ज़मानत के प्रावधानों से संबंधित
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (सीआरपीसी) के अध्याय 33 की निम्न चार धाराएं विशेष धाराएं हैं।
सीआरपीसी की धारा 436 सीआरपीसी (Crpc) की यह धारा यह उपबंधित करती है कि जहां
किसी ज़मानती अपराध के अभियुक्त को गिरफ्तारी व निरुद्ध किया जाता है तो वह
अधिकार के रूप में ज़मानत पर छोड़े जाने का दावा कर सकता है। यह धारा ऐसे सभी
मामलों के प्रति लागू होती है, जिनमें अभियुक्त किसी ज़मानतीय अपराध का दोषी है या वह
ऐसा व्यक्ति है, जिसने कोई अपराध नहीं किया है लेकिन इसके विरुद्ध संहिता के अध्याय 8
के अंतर्गत प्रतिभूति की कार्रवाई की गयी है। यह धारा किसी अन्य गिरफ्तारी या निरोध के
मामले में भी लागू होगी बशर्ते कि वह किसी गैर ज़मानतीय अपराध से संबंधित नहीं है। जब
कोई गैर ज़मानतीय अपराध के अभियुक्त से कोई व्यक्ति पुलिस थाने के भारसाधक
अधिकारी द्वारा बिना वारंट के गिरफ्तार व निरुद्ध किया जाता है या न्यायालय के समक्ष
हाजिर होता है तो उसे ज़मानत पर छोड़ दिया जाएगा। पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी
या न्यायालय उस व्यक्ति को ज़मानत पर छोड़ने के बजाय उससे प्रतिभूतियों सहित या
रहित बंधपत्र निष्पादित करवाकर उसे अभिरक्षा से उन्मोचित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के
एक फैसले में यह सुनिश्चित किया गया है कि जब अभियुक्त को किसी ज़मानतीय अपराध
के अभियोग की दशा में धारा 436 के अधीन जमानत पर छोड़ दिया जाता है उसके के बाद
पुलिस द्वारा उसकी रिहाई पर उसके विरुद्ध एक गैर जमानतीय अपराध और जोड़ दिया
जाता है। उस दशा में जारी की गई ज़मानत को निरस्त नहीं किया जा सकता। ज़मानत तो
धारा 439 (2) या 437 (5) के अधीन ही रद्द की जा सकती है। गुडी कांति नरसिंहुलु बनाम
लोक अभियोजक आंध्र प्रदेश 1978 उच्चतम न्यायालय के एक विशेष प्रकरण में जमानत
संबंधी कुछ नियम बनाये गये-
1)- मजिस्ट्रेट द्वारा ज़मानत मंज़ूर किए जाने अथवा नहीं किए जाने का निर्णय पूर्व
सावधानी बरतते हुए युक्तियुक्तता के आधार पर किया जाना चाहिए।
2)- ज़मानत नामंज़ूर की जाने के फलस्वरूप अभियुक्त को स्वतंत्रता के अधिकार से वंचित
किया जाता है इसलिए मजिस्ट्रेट द्वारा इसका प्रयोग दाण्डिक उद्देश्य से नहीं किया जाना
चाहिए अपितु अभियुक्त और समाज दोनों के हितों को ध्यान में रखते हुए किया जाना
चाहिए।
3)- ज़मानत के आवेदन पर विचार करते समय मजिस्ट्रेट को इस बात पर विशेष ध्यान देना
चाहिए कि ज़मानत पर छोड़ दिए जाने पर अभियुक्त गवाहों के लिए खतरा उत्पन्न तो नहीं
करेगा या न्यायिक कार्यवाही के संचालन में बाधा उत्पन्न नहीं करेगा।
4)- ज़मानत के आवेदन पर विचार करते समय मजिस्ट्रेट को अभियुक्त के पूर्व वृतांत को भी
ध्यान में रखना चाहिए और यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि अभियुक्त की आपराधिक
गतिविधियों में लिप्त होने की संभावना तो नहीं है।

5)- सामान्यता अभ्यस्त और घोर अपराधियों की ज़मानत मंजूर नहीं की जानी चाहिए।
सीआरपीसी की धारा 437 सीआरपीसी (Crpc) 1973 की धारा 437 गैर ज़मानतीय अपराध की
दशा में कब ज़मानत ली जा सकेगी, इस संदर्भ में उल्लेख कर रही है। दंड प्रक्रिया संहिता की
यह धारा उस न्यायालय को अधिकार दे रही है, जिसके समक्ष अभियुक्त को पेश किया जाता
है। इस धारा के अंतर्गत गैर जमानतीय अपराध के ऐसे मामलों में जो मृत्युदंड या आजीवन
कारावास से दंडित न हो न्यायालय या पुलिस द्वारा अभियुक्त को ज़मानत पर छोड़े जाने के
संबंध में प्रावधान है। धारा 437 के अंतर्गत न्यायालय के साथ ही पुलिस को भी यह शक्ति
दी गई है कि वह भी किसी व्यक्ति को जमानत पर छोड़ सकती है पर उसके लिए कुछ शर्ते
निहित की गई हैं-
यदि अभियुक्त-
1)- 16 वर्ष से कम आयु का है।
2)- महिला या बीमार है।
3)- असक्षम और शिथलांग व्यक्ति है।
अपराध मृत्युदंड आजीवन कारावास से दंडित होने पर भी उसे ज़मानत पर छोड़ा जा सकता
है यदि ऊपर वर्णित निम्न शर्तों की पूर्ति होती है तो ज़मानतीय अपराध के अभियुक्त को
न्यायालय या पुलिस द्वारा ज़मानत पर छोड़े जाने के लिए अपनी विवेक शक्ति का प्रयोग
करते समय न्यायालय या पुलिस यथास्थिति को कतिपय सामान्य सिद्धांतों को ध्यान में
रखना होगा। उच्चतम न्यायालय ने अपने अनेक निर्णय में अभिकथन किया कि अभियुक्त
को ज़मानत पर छोड़ने का उद्देश्य यह है कि वह जांच या विचारण के दौरान आवश्यकता
अनुसार अभियुक्त की न्यायालय में उपस्थिति सुनिश्चित कराई जा सके और उसे
विचाराधीन अवधि में दंड स्वरूप कारावास में न रहना पड़े।

अपने अनेक निर्णय में अभिकथन किया कि अभियुक्त
को ज़मानत पर छोड़ने का उद्देश्य यह है कि वह जांच या विचारण के दौरान आवश्यकता
अनुसार अभियुक्त की न्यायालय में उपस्थिति सुनिश्चित कराई जा सके और उसे
विचाराधीन अवधि में दंड स्वरूप कारावास में न रहना पड़े।

Web Desk
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