Tuesday, September 22, 2026
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जमानत अधिकार है, दया नहीं: पूर्व CJI Chandrachud’s की न्याय प्रणाली पर दो टूक राय

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जयपुर साहित्य उत्सव 2024 में देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश CJI Chandrachud द्वारा दिए गए बयान ने एक बार फिर भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली, जमानत के अधिकार और न्यायिक सुधारों पर व्यापक बहस को जन्म दिया है। वरिष्ठ पत्रकार वीर संघवी के साथ संवाद में उन्होंने न्याय, संविधान और न्यायपालिका की भूमिका को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कहीं।

CJI Chandrachud दोष सिद्ध होने से पहले जमानत: एक मौलिक अधिकार

पूर्व CJI डी. वाय. चंद्रचूड़ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब तक किसी व्यक्ति का दोष सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक जेल को सज़ा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में मामलों के निस्तारण में अत्यधिक देरी एक गंभीर समस्या है। ऐसे में यदि ट्रायल लंबा खिंच रहा है, तो आरोपी को जमानत मिलनी चाहिए।

यह टिप्पणी उस संदर्भ में आई जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद की दिल्ली दंगों की साजिश मामले में जमानत याचिका खारिज किए जाने पर चर्चा हो रही थी। चंद्रचूड़ ने इस बहस को व्यापक सिद्धांत के स्तर पर रखते हुए कहा कि व्यक्तिगत मामलों से परे, न्याय प्रणाली को स्वतंत्रता और निष्पक्षता के मूल्यों पर आधारित होना चाहिए।

भारतीय न्याय प्रणाली में देरी की समस्या

CJI Chandrachud ने स्वीकार किया कि भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में देरी संरचनात्मक समस्या बन चुकी है। लाखों मामले लंबित हैं और कई आरोपी वर्षों तक जेल में रहते हैं, जबकि उनका मुकदमा शुरू भी नहीं होता। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में जमानत न देना संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के विपरीत है।

अपने कार्यकाल के अहम फैसले

CJI Chandrachud ने अपने कार्यकाल के दौरान दिए गए कुछ ऐतिहासिक फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनका भारतीय समाज और लोकतंत्र पर गहरा प्रभाव पड़ा:

  • महिलाओं को सशस्त्र बलों में स्थायी कमीशन का अधिकार
  • समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर करना
  • चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक घोषित करना

इन फैसलों को उन्होंने संविधान के समानता, गरिमा और स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतों से प्रेरित बताया।

न्यायपालिका में पारदर्शिता और नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार

न्यायपालिका में जनता के विश्वास को मजबूत करने के लिए चंद्रचूड़ ने न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता बताई। उन्होंने सुझाव दिया कि उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में नियुक्तियों के दौरान सिविल सोसाइटी के प्रतिष्ठित और निष्पक्ष व्यक्तियों को भी शामिल किया जाना चाहिए। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और न्यायपालिका अधिक जवाबदेह बनेगी।

Procedural Inequity in Cross-Border Custody Disputes | The Legal Observer

वैवाहिक बलात्कार और कानून में सुधार

पूर्व CJI Chandrachud ने एक संवेदनशील सामाजिक मुद्दे की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि आज भी भारत में वैवाहिक बलात्कार को अपराध के रूप में मान्यता नहीं दी गई है, जो संविधान के समानता और महिलाओं की गरिमा के सिद्धांतों के खिलाफ है। उनके अनुसार, इस दिशा में कानून सुधार की तत्काल आवश्यकता है।

सुप्रीम कोर्ट को ‘लोगों का न्यायालय’ बनाने की पहल

अपने कार्यकाल की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में CJI Chandrachud ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही का लाइव प्रसारण शुरू करने का उल्लेख किया। यह प्रसारण न केवल हिंदी बल्कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराया गया, ताकि आम नागरिक भी न्यायिक प्रक्रिया को समझ सकें।

सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन

सेवानिवृत्ति के बाद अपने जीवन पर बात करते हुए पूर्व CJI ने कहा कि वे निजी जीवन का आनंद ले रहे हैं और किसी भी सरकारी या संवैधानिक पद को स्वीकार करने का इरादा नहीं रखते। उनके अनुसार, न्यायपालिका में रहते हुए उन्होंने जो योगदान दिया, वही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

निष्कर्ष

जयपुर साहित्य उत्सव में CJI Chandrachud के विचार केवल एक न्यायाधीश के बयान नहीं थे, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, संविधान और नागरिक स्वतंत्रता पर एक गहन विमर्श थे। जमानत को अधिकार के रूप में देखने, न्यायिक सुधारों की आवश्यकता और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर उनकी टिप्पणियाँ आने वाले समय में कानूनी और राजनीतिक बहसों को दिशा देने वाली हैं।

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