Tuesday, February 10, 2026

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बहुदिव्यांग महिला को तुरंत नौकरी देने का आदेश, कोल इंडिया को झटका

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सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग करते हुए कोल इंडिया लिमिटेड को बहुदिव्यांगता से जूझ रही असम की महिला सुजाता बोरा को तुरंत नौकरी देने का आदेश दिया है। अदालत ने कंपनी को निर्देश दिया है कि असम के तिनसुकिया जिले के मार्घेरिटा स्थित नार्थ ईस्टर्न कोलफील्ड्स कार्यालय में उनके लिए एक सुपरन्यूमेरी (अतिरिक्त) पद सृजित कर तुरंत नियुक्ति दी जाए।

क्या है पूरा मामला?

असम की रहने वाली सुजाता बोरा ने कोल इंडिया लिमिटेड के मैनेजमेंट ट्रेनी पद के लिए दृष्टिबाधित श्रेणी में आवेदन किया था और साक्षात्कार में सफल भी रहीं। लेकिन कंपनी ने उन्हें इस आधार पर अनुपयुक्त घोषित कर दिया कि वह केवल दृष्टिहीन नहीं हैं, बल्कि रिसिड्यूरी पार्शियल हेमीपैरिसिस से भी पीड़ित हैं — यह एक न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, जिसमें शरीर के एक हिस्से में कमजोरी या आंशिक पक्षाघात हो जाता है।

कंपनी के इस रुख को चुनौती देते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां महिला के पक्ष में न्याय हुआ।

कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने स्पष्ट कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार केवल औपचारिकता या कानूनी अनुपालन तक सीमित नहीं होने चाहिए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि—

  • कॉरपोरेट सेक्टर दिव्यांगता को कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) का अहम हिस्सा माने
  • दिव्यांगता समावेशन को ESG (Environment–Social–Governance) फ्रेमवर्क के ‘सोशल’ आयाम में मजबूत जगह दी जाए
  • दिव्यांगों को अवसर देने से न केवल सामाजिक न्याय बढ़ता है, बल्कि इससे संस्थानों की क्षमता, संवेदनशीलता और विश्वसनीयता भी बढ़ती है

क्यों अहम है यह फैसला?

यह फैसला सिर्फ एक महिला की नौकरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देशभर के कॉरपोरेट और सरकारी संस्थानों के लिए एक बड़ा संदेश है—
दिव्यांगता बाधा नहीं, बल्कि संवेदनशील नीति और समान अवसरों से सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश दिव्यांग अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल न्याय की जीत है, बल्कि समाज और कॉरपोरेट जगत के लिए यह याद दिलाने वाला संदेश भी है कि समावेशन ही असली प्रगति है।

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