Thursday, January 29, 2026

Supreme Court 2.0: 17 Judge की बेंच, मेट्रो Connectivity भविष्य की तैयारी”

Share

Supreme Court 2.0:भारत का सर्वोच्च न्यायालय केवल न्याय देने की संस्था नहीं, बल्कि देश के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों का सबसे बड़ा संरक्षक है। शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत द्वारा Supreme Court के बुनियादी ढांचे को लेकर की गई बातचीत ने यह साफ कर दिया कि न्यायपालिका अब सिर्फ वर्तमान नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की संवैधानिक जरूरतों को ध्यान में रखकर खुद को तैयार कर रही है।

Supreme Court 2.0:हेरिटेज भी बचेगा, भविष्य भी बनेगा

सीजेआई ने स्पष्ट किया कि Supreme Court का मौजूदा मुख्य भवन, जो एक हेरिटेज बिल्डिंग है, पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। लेकिन इसके साथ-साथ नए निर्माण कार्यों के जरिए अदालत के स्वरूप और क्षमता में ऐतिहासिक बदलाव किया जा रहा है।

नए परिसर में तीन नई संवैधानिक अदालतों (Constitutional Courts) का निर्माण किया जा रहा है, जो आकार और क्षमता दोनों में अब तक की सबसे बड़ी होंगी।

  • पहली अदालत में 17 जजों के बैठने की व्यवस्था
  • दूसरी में 15 जज
  • तीसरी में 13 जजों की क्षमता

यह प्रस्ताव अपने आप में इस बात का संकेत है कि सुप्रीम कोर्ट भविष्य में अत्यंत जटिल और ऐतिहासिक संवैधानिक प्रश्नों से निपटने के लिए खुद को संस्थागत रूप से मजबूत कर रहा है।

13 जजों से बड़ी पीठ: संवैधानिक संकट का संकेत?

सीजेआई की इस बात पर वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन की मजाकिया लेकिन गहरी टिप्पणी ने माहौल को गंभीर अर्थ दे दिया। उन्होंने कहा कि उम्मीद है कभी 13 जजों से बड़ी पीठ गठित करने की नौबत न आए।

यह टिप्पणी सीधे तौर पर केशवानंद भारती केस की ओर इशारा थी, जिसमें अब तक की सबसे बड़ी 13 जजों की पीठ बैठी थी और ‘बेसिक स्ट्रक्चर डॉक्ट्रिन’ जैसा ऐतिहासिक सिद्धांत सामने आया था।
वास्तव में, 13 से अधिक जजों की पीठ का गठन इस बात का संकेत होगा कि देश किसी अभूतपूर्व संवैधानिक संकट या परिवर्तन के मोड़ पर खड़ा है।

वकीलों के लिए बेहतर सुविधाएं, समावेशी सोच

नए परिसर में महिला वकीलों के लिए अलग बार रूम, सेंट्रली एयर कंडीशनिंग और आधुनिक सुविधाओं की योजना यह दर्शाती है कि न्यायपालिका अब केवल फैसलों तक सीमित नहीं, बल्कि कार्यस्थल की गरिमा और समावेशन पर भी ध्यान दे रही है।

सीजेआई ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष का कार्यालय CJI के चैंबर जितना भव्य होगा, ताकि वरिष्ठ वकीलों को चुनाव लड़ने के लिए ‘प्रोत्साहन’ मिले।
इस पर शंकरनारायणन की प्रतिक्रिया — “उम्मीद है कि वे इस ऑफिस के योग्य होंगे” — ने यह स्पष्ट कर दिया कि पद के साथ जिम्मेदारी और गरिमा भी उतनी ही जरूरी है।

जमानत अधिकार है, दया नहीं: पूर्व CJI Chandrachud’s की न्याय प्रणाली पर दो टूक राय

सुप्रीम कोर्ट तक सीधी मेट्रो: समय की मांग

देश की भौगोलिक और मौसम संबंधी चुनौतियों को देखते हुए सीजेआई ने Supreme Court तक सीधी मेट्रो कनेक्टिविटी का विचार भी रखा। बारिश, गर्मी और भीड़भाड़ के बीच वकीलों और वादियों के लिए निर्बाध आवागमन न्याय तक पहुंच को आसान बनाएगा।
यह कदम “Ease of Access to Justice” की दिशा में एक बड़ा सुधार माना जा सकता है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह बदलता स्वरूप सिर्फ ईंट-पत्थर का विस्तार नहीं, बल्कि संवैधानिक दूरदृष्टि, संस्थागत मजबूती और आधुनिक भारत की न्यायिक जरूरतों का प्रतिबिंब है।
जहां एक ओर विरासत को सहेजने की प्रतिबद्धता है, वहीं दूसरी ओर भविष्य के सबसे कठिन सवालों से जूझने की तैयारी भी।

यह बदलाव बताता है कि भारत की न्यायपालिका सिर्फ समय के साथ चल नहीं रही, बल्कि समय से आगे की सोच रख रही है।

Read more

Local News