Tuesday, February 10, 2026

सुप्रीम कोर्ट ने सावरकर की तस्वीरें हटाने की याचिका पर सुनवाई से किया इनकार, याचिकाकर्ता को चेतावनी के बाद वापसी

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एडिटोरियल: न्यायपालिका का संदेश—निरर्थक बहसों से आगे बढ़िए

सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय, जिसमें संसद और सार्वजनिक स्थानों से विनायक दामोदर सावरकर की तस्वीरें हटाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार किया गया, केवल एक कानूनी फैसला नहीं बल्कि एक गहरा संदेश है। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि न्यायपालिका को विवादों का मंच नहीं, बल्कि न्याय और संवैधानिक मूल्यों का संरक्षक समझा जाना चाहिए।

न्यायपालिका का समय केवल राजनीति का मैदान नहीं

पिछले कुछ वर्षों में जनहित याचिका (PIL) लोकतांत्रिक अधिकार से अधिक “विचारधारा की लड़ाई” का मंच बनती दिखाई दे रही है। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह इस याचिका को “मानसिकता का प्रतिबिंब” बताया और भारी लागत लगाने की चेतावनी दी, वह बताता है कि अदालत अब ऐसे मामलों के प्रति और अधिक सख्त रुख अपना रही है। अदालत का समय सीमित है और इसे सचमुच ज़रूरी, सार्वजनिक हित से जुड़े मुद्दों के लिए सुरक्षित रहना चाहिए—न कि प्रतीकात्मक राजनीतिक टकरावों के लिए।

इतिहास बहस का विषय, अदालत निर्णय का स्थान

सावरकर का नाम लंबे समय से राजनीतिक ध्रुवीकरण का विषय रहा है। लेकिन अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि इतिहास, वैचारिक मतभेद और राजनीतिक व्यक्तित्वों पर न्यायालय निर्णय देने का उपयुक्त मंच नहीं हैं। संसद की दीवारों पर लगी तस्वीरें केवल चेहरे नहीं, बल्कि इतिहास की जटिलता और बहुस्तरीयता का हिस्सा हैं। उन्हें हटाने की मांग अदालत के माध्यम से करना मूलतः गलत दृष्टिकोण है।

याचिकाकर्ताओं की जिम्मेदारी भी जरूरी

सेवानिवृत्त IRS अधिकारी द्वारा दायर यह याचिका शायद किसी व्यक्तिगत वैचारिक सोच का परिणाम थी, पर न्यायालय ने यह भी बताया कि सामाजिक प्रतिष्ठा और अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी आती है। जनहित याचिका तभी दायर होनी चाहिए जब वास्तव में व्यापक सार्वजनिक हित प्रभावित हो—न कि विचारधारात्मक असहमति के कारण।

निष्कर्ष: आगे बढ़ने का समय

यह फैसला याद दिलाता है कि समाज को आगे बढ़ने की आवश्यकता है। हमें न्यायपालिका पर अनावश्यक दबाव डालने वाली याचिकाओं से दूर रहकर वास्तविक समस्याओं—रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, न्यायिक सुधार और सामाजिक असमानता—पर संवाद करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने एक सरल लेकिन सशक्त संदेश दिया है—न्यायपालिका राजनीतिक प्रतीकों की लड़ाई का मैदान नहीं, बल्कि राष्ट्र के विवेक का केंद्र है।

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