टीवी पर चल रही नफरती बहसों पर कब लगेगी लगाम! क्या सुप्रीम कोर्ट की फटकार भर से बंद होंगी उन्मादी टीवी बहसें!

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File Photo- Nupur Sharma

भारत की सर्वोच्च अदालत ने भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के पैगंबर मोम्मद के खिलाफ अभद्र टिप्पणी मामले में सुनवाई करते हुए टीवी चैनलों पर चल रहे भौड़ेपन पर कठोर टिप्पणी की है। नूपुर शर्मा के बयान के बाद देश के अलग-अलग स्थानों पर हुई घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बैंच ने नूपुर शर्मा को जिम्मेदार मानते हुए देश से माफी तक मांगने के लिए कह दिया। कोर्ट ने ये भी कहा कि एक मामला जो पहले से ही अदालत में चल रहा है उससे टीवी चैनल का क्या लेना देना, ये केवल एक ऐजेन्डा मात्र का हिस्सा है। हालांकि नूपुर शर्मा की तरफ से पेश वरिष्ठ वकील ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि नूपुर शर्मा ने ये बयान इसलिए दिया था क्योंकि दूसरे पैनलिस्ट ने उन्हें ये बयान देने के लिए उकसाया था। इसी बीच स्वयंभू दक्षिणपंथी कार्यकर्ता अजय गौतम ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन्ना को पत्र लिखकर मांग की है कि जस्टिस सूर्यकांत की तरफ से की गयी टिप्पणियों को वापस लिया जाऐ। 

File Photo- Supreme Court of India

देश में ये पहला मौका नहीं है जब टीवी पर होने वाली बहस को सुप्रीम कोर्ट ने बेवजह करार दिया हो। टीवी चैनल अपनी टीआरपी रेटिंग के चलते हर हालातों में केवल अपनी तरफ दर्शकों को खींचना चाहते हैं। चैनलों में होड़ सी लगी है कि कौन कितना विवादस्पद मुद्दा उठाये, जिस पर गर्मा-गर्म बहस ही न हो, बल्कि बहस में हिस्सा लेने आये प्रतिभागी एक दूसरे के साथ वाद-विवाद करते-करते गाली गलौच पर भी उतर आये। फिर उस हिस्से को सोशल मीडिया प्लेटफार्म जैसे फेसबुक, टिव्टर, इंस्टाग्राम के माध्यम से वायरल कराया जाऐ और जनमानस में किसी एक पक्ष के खिलाफ गुस्सा भड़काया जाऐ।

हालांकि ये पहला मौका नहीं है जब टीवी चैनल पर बैठे प्रवक्ताओं या ऐंकरों ने ऐसी भाषा का प्रयोग किया है जिसने देश की सर्वोच्च अदालत को ये कहने पर मजबूर कर दिया हो कि इससे खराब और क्या बात हो सकती है। भारत के सूचना एंव प्रसारण मंत्रालय से लाईसेंस प्राप्त एक चैनल ने एक सीरीज ही चला दी जिसका विषय था कि सिविल सेवा में मुसलमानों की ही भर्ती सोची समझी साजिश के तहत की जा रही है। चैनल के सीरीज कार्यक्रम के माध्यम से पूरी सिविल सेवा परीक्षा की गंभीरता पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया गया। मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा तो दिल्ली हाईकोर्ट ने अगले प्रसारण के लिए रोक लगा दी जिस पर चैनल सुप्रीम कोर्ट जा पहुंचा। तीन सदस्यीय बैंच की अध्यक्षता कर रहे सर्वोच्च न्यायालय के तीसरे सबसे वरिष्ठ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि , “एक ऐंकर आकर कहता है कि एक विशेष समुदाय यूपीएससी में घुसपैठ कर रहा है। क्या इससे ज़्यादा घातक कोई बात हो सकती है। ऐसे आरोपों से देश की स्थिरता पर असर पड़ता है और यूपीएससी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर लांछन लगता है।”

इसी सुनवाई के दौरान जस्टिस केएम जोसेफ ने केन्द्र सरकार से सवाल पूछा था कि क्या आज कोई ऐसा कार्यक्रम है जो आपत्तिजनक नहीं है? रोजाना लोगों की आलोचना होती है, निंदा होती है और लोगों की छवि खराब की जाती है।

जिस चैनल के विवादित कार्यक्रम पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा था उसी मामले में केन्द्र सरकार ने तो हलफनामा दाखिल करके यहां तक कह दिया कि इलेक्ट्रानिक मीडिया ने जहरीली नफरत फैलाते हुए जानबूझकर न केवल हिंसा, बल्कि आतंकवाद को भी बढ़ावा दिया है। वेब आधारित डिजिटल मीडिया व्यक्तियों और संस्थानों की छवि को धूमिल करने में सक्षम है और यह प्रथा खतरनाक है। 

लेकिन यहां बात एक ट्रैंड की तरह चल रही है जहां टीवी पर रोज दिखाये जाने वाले धार्मिक उन्मादों से भरे विवादस्पद कार्यक्रमों की होड़ है जिस पर सरकारों की चुप्पी साफ दिखायी देती है। मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर हस्तक्षेप न करने का बहाना बताने वाली सरकारें जानती हैं कि धार्मिक उन्माद का आखिर में फायदा किसका होगा। इसलिए शायद मीडिया खासकर न्यूज चैनलों पर लगाम लगाये जाने की आदर्श बातें तो कहीं जाती हैं, लेकिन जब उन पर अमल का नंबर आता है तो चुप्पी।

सवाल फिर भी वही आखिर कब तक मीडिया की स्वतंत्रता के नाम पर टीवी चैनलों को मौका दिया जाता रहेगा कि वो हर शाम कोई न कोई धार्मिक उन्माद फैलाने वाले कार्यक्रमों को प्रसारण करते रहेंगे और साथ ही कार्यक्रम में शामिल वक्ताओं के घृणित और अपमानजनिक बयानों का धड़ल्ले से प्रचार-प्रसार करते रहेंगे। 

Khurram Nizami
Khurram Nizami

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  1. Constitutional provisions which are relevant in this regard can be referred thereby making the discussion more meaningfull.This can be done without creating hatred or disrespect to any religion or thought.

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