बागी विधायकों की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज, कोर्ट के फ़ैसले के बाद तय होगा महाराष्ट्र का सियासी भविष्य

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महाराष्ट्र का सियासी संकट सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है। डेप्युटी स्पीकर द्वारा भेजे गए नोटिस को अयोग्य ठहराने की माँग को लेकर शिव सेना के बाग़ी विधायकों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया है। 15 विधायकों द्वारा डाली गई याचिका पर आज सोमवार को सुनवाई होगी। 

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी परदीवाला की पीठ याचिका पर सुनवाई करेगी। एकनाथ शिंदे गुट की तरफ से सीनियर एडवोकेट हरीश साल्वे, शिवसेना की ओर से कांग्रेस नेता और सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी दलील रखेंगे। वहीं महाराष्ट्र सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट देवदत्त कामत और डिप्टी स्पीकर की ओर से कपिल सिब्बल पेश होंगे।

फ़्लोर टेस्ट की बन सकती है स्थिति 

महाराष्ट्र का राजनीतिक भविष्य कोर्ट की सुनवाई पर निर्भर है। एकनाथ शिंदे के पक्ष में फ़ैसला आने की स्थिति में उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली महाअघाड़ी सरकार की मुश्किलें बढ जाएँगी। ऐसे में उन्हें फ़्लोर टेस्ट के लिए भी जाना पड़ सकता है।

बागी विधायकों का डेप्युटी स्पीकर से विवाद 

शिवसेना के 37 विधायकों ने शुक्रवार को एकनाथ शिंदे को नेता सदन बनाए रखने की माँग को लेकर डेप्युटी स्पीकर को चिट्ठी भेजी थी लेकिन डेप्युटी स्पीकर ने उद्धव ठाकरे गुट के अनुरोध पर अजय चौधरी को नेता सदन बनाया। जिसके विरोध में बागी विधायकों ने डेप्युटी स्पीकर के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया जो फ़िलहाल ख़ारिज हो गई है।

इससे पहले ठाकरे गुट ने बुधवार को बुलाई गई बैठक में शामिल ना होने के कारण 16 विधायकों को डिस्क्वालिफ़ाई करने की डेप्युटी स्पीकर से माँग की थी।

एंटी डिफ़ेक्शन लॉ पर छिड़ी बहस 

दोनों गुटों के सियासी खिंचतान के बाद एंटी डिफ़ेक्शन लॉ पर एक बार फिर क़ानूनी बहस छिड़ गई है। 1985 में संविधान संसोधन (52वाँ) कर बने इस क़ानून का मक़सद दल बदल के प्रचलन को रोकना था। अपेक्षित नतीजे ना आने पर इसमें आगे भी बदलाव किए गए। लेकिन आज भी स्थिति में बहुत बदलाव नहीं आया है। 

Indian Legal Reporter की टीम से लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य ने एंटी डिफ़ेक्शन लॉ की नियति के बारे में विस्तार से बातचीत की। उनके अनुसार “एंटी डिफ़ेक्शन लॉ चाहता है कि सदस्य जिस पार्टी के सिम्बल से चुन कर आए वह अपने कार्यकाल के दौरान उसी पार्टी में रहे। सदन में मौजूद पार्टी के कुल सदस्यों की संख्या का दो तिहाई अगर किसी अन्य राजनीति पार्टी के साथ मर्जर करता है तभी उसे स्वीकार किया जाएगा। अन्य किसी भी परिस्थिति में बाग़ी सदस्यों को डिस्क्वालिफ़िकेशन झेलना पड़ेगा।”

एंटी डिफ़ेक्शन लॉ के हिसाब से महाराष्ट्र विधानसभा के अंदर मौजूद शिवसेना के दो तिहाई सदस्य अगर बीजेपी के साथ मर्ज करते हैं तभी वह डिस्क्वालिफ़िकेशन से बच सकते हैं। 

अब इस स्थिति में सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है कि अगर संगठन के पदाधिकारी और कार्यकर्ता मर्जर के लिए राज़ी ना हो तो क्या विधायकों का फ़ैसला मान्य होगा?

इस प्रश्न के जवाब में पीडीटी आचार्य ने बताया कि बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा खंडपीठ के जजमेंट के हिसाब से राजनीतिक दल के संगठन का मर्जर ज़रूरी नहीं है। सदन के अंदर अगर पार्टी के दो तिहाई विधायक किसी अन्य पार्टी के साथ मर्ज़ करते हैं तो वह कानूनी रूप से मान्य होगा। सदन के अंदर संगठन का मत मायने नहीं रखता।

आगे की संभावना 

एकनाथ शिंदे अभी शिवसेना से इस्तीफा नहीं दे रहे हैं, वह दो तिहाई संख्या के साथ सदन के अंदर पार्टी पर दावा कर रहे हैं। इसके ज़रिए वह एंटी डिफ़ेक्शन कानून का उल्लंघन करने से बच सकते हैं।

पिछले वर्ष चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस की लड़ाई में लोक जनशक्ति पार्टी को भी ऐसी ही परिस्थिति का सामना करना पड़ा था। जब लोजपा के 5 बागी सांसदों ने पार्टी के मौजूद राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान को ही पार्टी से बाहर निकाल दिया था। 

वहीं उद्धव ठाकरे गुट द्वारा बागी विधायकों को निलम्बित करने माँग पर डेप्युटी स्पीकर ने बागी विधायकों को नोटिस भेजा है। जिस पर बागी विधायकों को 27 जून तक जवाब दाखिल करना है।

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